आज स्वप्न में प्रिय मित्र भाई विद्या प्रकाश नज़र आए | उनकी याद इस क़दर आई कि कुछ लिखने को मजबूर हो गया | आत्मिक शांति के लिए यह नागुज़ीर भी था | अपनी बहुमुखी प्रतिभा से हिंदी जगत को ओतप्रोत करनेवाले सुख्यात पत्रकार विद्या प्रकाश लगभग पांच वर्ष पहले हमसे हमेशा के लिए दूर हो गए | 13 मई 2017 को देर रात लगभग सवा दो बजे उनके पैतृक नगर जौनपुर [ उत्तर प्रदेश ] में देहांत हो गया था | वे 66 वर्ष के थे |
मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मछलीशहर के जमुहर गाँव के रहनेवाले श्री श्रीवास्तव जौनपुर के सिपाह में दशकों से रहते थे | वे लीवर कैंसर से पीड़ित थे और मृत्यु पूर्व चिकुनगुनिया से ग्रसित रहे | वे तीन दशक से अधिक समय सक्रिय पत्रकारिता से जुड़े रहे | हर विषय पर प्रायः सामान्य अधिकार रखते थे | वे विविध विषयों पर लगातार लिखते रहे | विद्या प्रकाश जी अपने पीछे पत्नी गीता श्रीवास्तव [ एडवोकेट ] , बेटे डॉ . अनुराग और बेटी जूही को छोड़ गये |
विद्या प्रकाश का पूरा नाम विद्या प्रकाश श्रीवास्तव है , लेकिन वे सदा ‘ विद्या प्रकाश ‘ नाम से लिखते रहे | उन्होंने अपने नाम के साथ कभी जातिसूचक शब्द नहीं लगाया | आज देखते हैं कि अक्सर लोग जातिबोध शब्द लगातार फ़ख़्र का अनुभव करते हैं |
विद्या भाई बहुत सादगी पसंद थे , बड़े व्यवहार कुशल थे | हमेशा मीठी बातें करते और बातचीत के केंद्र में होता समाज और देश का कोई मसला | अपने लंबे पत्रकारिता सफर में उन्होंने दैनिक आज , दैनिक जागरण , दैनिक मान्यवर , तरुण मित्र , दिल्ली न्यूज़ आदि में कार्य किया | लेखन उनके आत्मिक संतोष का बड़ा ज़रिया था | विद्या प्रकाश जी कहीं भी कार्यरत रहे हों , मगर वे मुझसे गाहे बगाहे बात करना कभी नहीं भूलते थे | प्रायः प्रत्येक सप्ताह उनके लेख हमें मिलते और हम उन्हें प्रकाशित करते | कहानी , लघुकथा , कविता से लेकर रिपोर्ताज तक लिखना उनके लिए बड़ा सहज होता | वास्तव में वे पत्रकारिता के आल राउंडर थे | हिंदी साहित्य में एम ए थे |
विद्या प्रकाश जी ऐसा लिखते कि हमें अधिक संपादन की आवश्यकता नहीं पड़ती थी | लगभग सभी विषयों पर ऐसा प्रभावपूर्ण – तथ्यपरक लिखते कि सब मंत्रमुग्ध हो जाते | ऐसे में कभी मुझ पर ये आरोप भी लगे कि मैं आलेख लिखकर ‘ विद्या प्रकाश ‘ नाम [ छद्म नाम ] डाल देता हूँ | विद्या प्रकाश नाम के कोई सज्जन नहीं हैं | अपनी अंतिम यात्रा के कुछ ही समय पहले उन्होंने जो लेख भेजे थे , उनमें एक लेख हिंदी भाषा विषयक था , जिसका शीर्षक है ‘ हिंदी भाषा में विदेशी भाषाओँ के शब्द ‘ | इस लेख में उन्होंने हिंदी में आये अरबी शब्दों का विशेषकर उल्लेख किया है | विद्या प्रकाश जी एक गंभीर अध्येता भी थे | उनसे मोबाइल पर अक्सर बात होती | कम बोलते , लेकिन सधी हुई भाषा बोलते | अपने बेटे की शादी की , तो निमंत्रण दिया | मोबाइल पर भी बात की , किन्तु व्यस्तता के चलते मैं शादी – समारोह में शामिल नहीं हो सका | विद्या प्रकाश जी से मेरी एक बार भेंट हुई थी | भेंट के दौरान मैंने उनसे लिखने का आग्रह किया , तो उन्होंने लिखने का वादा कर लिया और इस वादे को जीवन पर्यन्त निभाया भी | ऐसे लोग विरले ही मिलते हैं , वह भी आज के ज़माने में | अभी कुछ ही महीने पहले मैंने उनके सुपुत्र डॉक्टर अनुराग श्रीवास्तव से अनुरोध किया था कि अपने पिताजी पर कुछ संस्मरण मेरे पास छपने के लिए भेजें | उन्होंने हामी भरी , लेकिन व्यस्तता के कारण अभी कुछ योगदान नहीं कर सके |
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