साहित्य

राह पकड़ तू एक चला चल 

  मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवाला, ‘किस पथ से जाऊँ ?’ असमंजस में है वह भोलाभाला; अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ- ‘राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला’। पौधे आज बने हैं साकी ले-ले फूलों का प्याला, भरी हुई है जिनके Read more…

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जब प्रेमचंद की गाय कलक्टर के घर में घुसी …

हिंदी और उर्दू साहित्य के दृढ़तम स्तंभ मुंशी प्रेम चंद शुरू से ही उच्चाधिकारियों के प्रति अति स्वाभिमानी थे | जब अगस्त 1916 ई. में प्रेम चंद का तबादला बस्ती से गोरखपुर के नार्मल स्कूल हो गया था, उन्हीं दिनों उनकी गाय अंग्रेज़ कलक्टर के अहाते में चली गई | Read more…

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सुमंत मिश्र – एक खोजी और शोधी पत्रकार

1984 में जब मैंने वाराणसी में दैनिक ” आज ” ज्वाइन किया, तब सुमंत मिश्र जी को डेस्क पर पाया | दयानन्द जी ने बताया कि कुछ महीने पहले ही ” दैनिक जागरण ” से यहां आए हैं | मुझे उनकी ज़हानत का पता उस दिन चला, जब उन्होंने अंग्रेज़ी Read more…

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संपादक नहीं ‘ तूफ़ान ‘ थे बच्चन सिंह

  मुझे कई नामचीन संपादकों के साथ काम करने का मौक़ा मिला | इन यशस्वी संपादकों में गुरुवर पंडित लक्ष्मी शंकर व्यास जी, गुरुवर चंद्र कुमार जी, बड़े भाई सत्य प्रकाश ‘असीम’ जी आदि के नाम हैं ही | बच्चन सिंह जी का नाम मैं इनमें क़तई नहीं जोड़ना चाहता हूँ, क्योंकि मैंने ‘ स्वतंत्र भारत Read more…

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प्रलय-गाण्डीव की टंकार हूँ मैं  

सलिल–कण हूँ कि पारावार हूँ मैं? स्वयं छाया, स्वयं आभार हूँ मैं । बँधा हूँ स्वप्न है, लधु वृत्त में हूँ नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं । समाना चाहती जो बीन–उर में विकल वह शून्य की झंकार हूँ मैं । भटकता खोजता हूँ ज्योति तम में , सुना Read more…

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आओ, अपने मन को टोवें !

व्यर्थ देह के संग मन की भी निर्धनता का बोझ न ढोवें। जाति पातियों में बहु बट कर सामाजिक जीवन संकट वर, स्वार्थ लिप्त रह, सर्व श्रेय के पथ में हम मत काँटे बोवें! उजड़ गया घर द्वार अचानक रहा भाग्य का खेल भयानक बीत गयी जो बीत गयी, हम Read more…

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ग़रीब देश का लोकतंत्र

गणतन्त्र दिवस के सुअवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं – आज फिर स्व . रामचन्द्र राव होशिंग की दो कविताएं याद आ रही है , जिनमें से एक का शीर्षक है – ” गणतन्त्र दिवस की पूर्व संध्या ” गणतन्त्र दिवस की पूर्व संध्या विशाल परेड – पूर्वाभ्यास – Read more…

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जब जीवंत हुईं उत्तराखंड की लोककलाएँ 

निश्चय ही ‘ प्रकृति के सुकुमार कवि ‘ सुमित्रानंदन पन्त जी आज अगर जीवित होते , तो कल्पनातीत रूप से प्रसन्न होते , फिर भी उनकी अजर – अमर आत्मा को अवश्य ही परम शांति प्राप्त हो रही होगी ….. कौसानी [ अल्मोड़ा – कुमाऊं ] में 1900 ई. में Read more…

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नवजातों को कौन बचाएगा ?

कन्या भ्रूण – हत्या की बढ रही घटनाएँ चिंता का विषय बनी हुई हैं | आज 29 दिसंबर 2018 को यह ख़बर आई कि नई दिल्ली के लोनी बार्डर थानान्तर्गत इंद्रापुरी कॉलोनी में सुबह लगभग साढ़े नौ बजे अधिशासी अभियंता कार्यालय के पास एक नवजात कन्या का शव पुलिस ने बरामद किया Read more…

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इनसे मिलिए ये हैं …….

पाँवों से सिर तक जैसे एक जनून बेतरतीबी से बढ़े हुए नाख़ून कुछ टेढ़े-मेढ़े बैंगे दाग़िल पाँव जैसे कोई एटम से उजड़ा गाँव टखने ज्यों मिले हुए रक्खे हों बाँस पिण्डलियाँ कि जैसे हिलती-डुलती काँस कुछ ऐसे लगते हैं घुटनों के जोड़ जैसे ऊबड़-खाबड़ राहों के मोड़ गट्टों-सी जंघाएँ निष्प्राण Read more…

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अखिलेश मिश्र जैसे सच्चे पत्रकार अब कहाँ ?

स्वनामधन्य मूर्धन्य पत्रकार एवं सम्पादकाचार्य  आदरणीय अखिलेश मिश्र जी के बारे में अब मैं कोई चर्चा तक नहीं सुनता | क्या हो गया है लोगों को ? जिस विभूति ने अपना सारा जीवन पत्रकारिता के हवाले कर दिया हो , वह भी जनपक्षधर पत्रकारिता के हवाले , उसे याद तक न Read more…

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विष्णु प्रभाकर : कुछ यादें, कुछ बातें 

  विष्णु प्रभाकर जी ‘आख़िर क्यों ?’ क्या आपको अपने प्रश्नों का उत्तर मिल गया ? परमात्मा ने आपको जो दीर्घायु [ जन्म 21 जून 1912 ई.  –  मृत्यु 11 अप्रैल 2009 – 97 वर्ष ] प्रदान की और आपने जिस तरह लगन, निपुणता और प्रांजलता के साथ अपने अनुभवों को Read more…

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अब मुझे क़ुरबां अपनी ही फ़िक्र है

अब मुझे क़ुरबां अपनी ही फ़िक्र है , मैं भला किसी को कैसे बुरा कहूँ | मगर नहीं वजूद मेरा झुका हुआ , मैं भला उसको कैसे बेसुरा कहूँ | अब नहीं मुझे किसी का ख़ौफ़ रहा , क्या कहूँ , किसको यूँ आमिरा कहूँ | तेरी पारसाई क्यों न चली Read more…

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त्रिविष्टप और अर्धनारीश्वर 

कभी नहीं चाहा था वह बदनुमा त्रिविष्टप शील – शुचिता, मर्यादा रहित उच्छृंखल, उद्दंड विलासी समाज त्रिविष्टप सरीखा जो स्वर्ग होकर भी नरक बना ! आर्यावर्त की पांचाली संस्कृति का मूक गवाह बना ! शायद इसीलिए त्रिपुरारी शिव ने न त्रिविष्टप रीति को पसंद किया न ही आर्यावर्त कुनीति को Read more…

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बाल साहित्य / ग़ज़ल शैली में पहेलियाँ 

– [ स्व.] बम बहादुर सिंह ‘ सरस ‘ [ बलरामपुर, उत्तर प्रदेश ] [ 1 ] छिलके में दोष भारी, छिलका बहुत फिसलता , फल है सभी को प्यारा, दर्जन के भाव बिकता | [ 2 ] खंभे की भांति मोटे हैं, चार पाँव उसके , धनवान पालते हैं , Read more…