साहित्य

सत्कर्म तुम करते रहो

  सत्कर्म तुम करते रहो जो कभी मिटता नहीं ,पाषाण पर रोपा गया पौधा कभी फलता नहीं . उठो , हिम्मत – हौसले से निज कर्तव्य में लग जाओ कुंठा ,निराशा , हताशा को पास कभी मत लाओ जो है सच्चा इन्सान कभी पुरुषार्थ से डिगता नहीं , पाषाण पर Read more…

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दीपक की सामूहिक खोज

[ 1 ] कोई ऐसा चराग़ लाओ मेरे दोस्तो , जो हर शै को अँधेरे से निकाल लाए | – राम पाल श्रीवास्तव ‘अनथक’ [ 2 ] आओ सब मिलकर एक – एक दीप जलाएं , अब मुश्किल नहीं है अँधेरे को मिटाना | -राम पाल श्रीवास्तव ‘अनथक’

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शब्दों की अमरता , अक्षयता एवं  संहारकता 

यह एक महत्वपूर्ण विषय है , अपने लिए भी और दूसरों के लिए भी | वास्तव में शब्द असीम है , अमर है  … नाम , रूप से परे है  , लेकिन है यह बड़ा व्यापक ……  एक ओर तो यह  है बहुत ही  प्रचंड और तीक्ष्ण !  इतना कि Read more…

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न किसी की आँख का नूर हूँ : बहादुर शाह ज़फ़र

न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ जो किसी के काम न आ सका मैं वो एक मुश्ते गु़बार हूं मेरा रंग रूप बिगड़ गया, मेरा बख़्त मुझसे बिछड़ गया जो चमन ख़िज़ां में उजड़ गया मैं उसी की फस्ले बहार हूं मैं Read more…

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शक्ति दो ऐसी कि यह वाणी सदा स्पंदित रहे 

इधर दानव पक्षियों के झुंड उड़ते आ रहे हैं क्षुब्ध अम्बर में , विकट वैतरणिका के अपार तट से यंत्र पक्षों के विकट हुँकार से करते अपावन गगन तल को , मनुज – शोणित – मांस के ये क्षुधित दुर्दम गिद्ध . कि महाकाल के सिंहासन स्थित हे विचारक शक्ति Read more…

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विभीषिकाएं – घबराइए नहीं , दुःख निर्मलकर्ता है

मानवता को देख डूबते , अंधकार के आलोक में कुपित सलिला उफनाई दुःख – अशांति के शोक में ! मनुजता ही निःशेष नहीं तो मान्यता किस काम की ? बीते कोप बिसार लगें हम नव – निर्माण के लोक में | ……. पौरुष है कहता , बिखराएं किरण नव – Read more…

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विष्णु प्रभाकर – साहित्य के शिखर पुरुष ही नहीं , सच्चे इंसान दोस्त भी

वरिष्ठ एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार विष्णु प्रभाकर जी की पुण्यतिथि [ 11 अप्रैल ] हर वर्ष मुझे संतप्त और ग़मगीन कर जाती है | प्रेम चंद , जैनेन्द्र , अज्ञेय और यशपाल जैसे दिग्गज रचनाकारों के सहयात्री रहे विष्णु प्रभाकर जी की अपनी अलग पहचान थी | मुझे फ़ख्र है , Read more…

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तुम सच बोलो

बादल गरजें या फिर बरसें आशाएं न छोड़ो मौसम कैसा भी हो तुम सच बोलो | चहुँदिश आंगन में हवा चले कितनी सर्दीली घात करे प्रतिघात से चाल कितनी कंटीली संयम की बातें सुनकर हुई कितनी भड़कीली जल के अजस्र स्रोत बहें राह कितनी पथरीली तुम भी जागो , हम Read more…

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महल आबाद है , झोपड़ी उजाड़ है [ Poem ]

सेठ है , शोषक है , नामी गलाकाटू है , गालियाँ भी सुनता है , भारी थूकचाटू है | चोर है , डाकू है , झूठा – मक्कार है , क़ातिल है , छलिया है , लुच्चा और लभार है | जैसे भी टिकट मिला , जहाँ भी टिकट मिला Read more…

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परस्पर संवाद करो  , वार्तालाप करो 

सद्भाव समय की बड़ी आवश्यकता है | कुछ लोगों का यह कथन नितांत उचित एवं सहमतियोग्य  है कि ” सभी को सभी धर्मों के ग्रन्थ पढ़ने चाहिए जिससे  सांप्रदायिक सद्भाव और बढ़े  “.इससे आगे की थोड़ी बात मैं अपने निकट मित्र एवं वरिष्ठ लेखक – कवि डा . ज्ञानचन्द्र जी  Read more…

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मेरे जीवन की जीवटता पंडित जी की देन 

ललित निबंध के पुरोधा पद्म भूषण पंडित विद्यानिवास मिश्रजी (14 जनवरी, 1926 – 14 फरवरी, 2005) बहुत मुदुभाषी , अत्यंत मिलनसार व्यक्तित्व का नाम है | पंडित जी से मेरी पहली भेंट वाराणसी में हुई, जब 1983 में आप काशी विद्यापीठ के कुलपति नियुक्त हुए I उस समय मैं विद्यापीठ Read more…

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प्राणमय कर्मशक्ति 

वे चिरकाल रस्सी खींचते हैं , पतवार थामे रहते हैं , वे मैदानों में बीज बोते हैं , पका धान काटते हैं , वे काम करते हैं , नगर और प्रान्तर में . राजच्छ्त्र टूट जाता है , रण – डंका बंद हो जाता है . विजय – स्तम्भ मूढ़ Read more…

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मैनडीह का स्मृति-गवाक्ष

[ 1 ] आज फिर उसी तिराहे पर खड़ा हूँ जहाँ से जीवन शरू हुआ जहाँ पला – बढ़ा  धूप की प्रचंडता देखी शीतल समीर के साथ छांव में लिपटी कुहासे की चादर ओढ़े सोयी रहती थी वह मेरा जीवन , मेरी लय , मेरी गति थी …. . … Read more…

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आज कहाँ गई वह पत्रकारिता और कहाँ गये वे पत्रकार ?

खल गनन सों सज्जन दुखी मति होहिं हरिपद मति रहे | अपधर्म छूटै सत्य निज भारत गहै कर दुःख बहै | बुध तजहिं मत्सर नारिनर सम होंहि जब आनन्द लहैं | तजि ग्राम कविता सुकवि जन की अमृत बानी सब कहैं | – भारतेन्दु हरिश्चंद 1868 ई. में जब आपने Read more…

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प्रार्थना

इधर दानव पक्षियों के झुंड उड़ते आ रहे हैं क्षुब्ध अम्बर में , विकट वैतरणिका के अपार तट से  यंत्र पक्षों के विकट हुँकार से करते  अपावन गगन तल को , मनुज – शोणित – मांस के ये क्षुधित दुर्दम गिद्ध . कि महाकाल के सिंहासन स्थित हे विचारक शक्ति Read more…